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14 June, 2017

कल से बेहतर कल करूँ, कोशिश नेक अनेक

 आँख न देखे आँख को, किन्तु कर्मरत संग |
संग-संग रोये-हँसे, भाये रविकर ढंग ||

गला-काट प्रतियोगिता, प्रतियोगी बस एक |
कल से बेहतर कल करूँ,  कोशिश नेक अनेक ||

चमके सुन्दर तन मगर, काले छुद्र विचार |
स्वर्ण-पात्र में ज्यों पड़ी, कीलें कई हजार ||

जब गठिया पीड़ित पिता, जाते औषधि हेतु।
डॉगी को टहला रहा, तब सुत गाँधी सेतु।।

समझौते करके रखा, दुनिया को खुशहाल।
मैं भी सबसे खुश रहा, सबकी त्रुटियाँ टाल।।

अच्छी आदत वक्त की, करता नहीं प्रलाप।
अच्छा हो चाहे बुरा, गुजर जाय चुपचाप।।

लक्ष्मण खींचे रेख क्यों, क्यों जटायु तकरार।
बुरा-भला खुद सोच के, नारि करे व्यवहार।।

11 June, 2017

रविकर यदि छोटा दिखे, नहीं दूर से घूर

लोकगीत लोरी कथा, व्यथा खुशी उत्साह।
मिट्टी के घर में बसे, रविकर प्यार अथाह।।

कंक्रीट सीमेंट में, बही समय की रेत।
व्यवहारिकता बच गयी, चढ़ा स्वार्थ का प्रेत।।

थ्री बी यच के मे रहे, बच के कैसे भाव।
धीरे धीरे ही सही, शुरू आज अलगाव।।

रविकर अच्छे कर्म कर, फल की फिक्र बिसार।
आम संतरा सेब से, पटे पड़े बाजार।।

नींद शान्ति पानी हवा, साँस खुशी उजियार।
मुफ्तखोर लेकिन करें, महिमा अस्वीकार।।

रविकर यदि छोटा दिखे, नहीं दूर से घूर।
फिर भी यदि छोटा दिखे, रख दे दूर गरूर।।

मत पालो खुद शत्रुता, पा लो उच्चस्थान।
शत्रु मिलें खैरात में, रविकर मान न मान।

पर्व मना या मत मना, मना न हो! मनमीत।
पत्नी भी तो पर्व है, करो मना के प्रीत।।

होती पाँचो उँगलियाँ, कभी न एक समान।
मिलकर खाती हैं मगर, रिश्वत-धन पकवान ।।

लोन लगे लकड़ी जले, तले तेल तन तेज।
रंग उड़े अंतर कुढ़े, फिर से रँग रँगरेज ।।

शिल्पी से शिल्पी कहे, पूजनीय कृति मोर।
पर, प्रभु तेरी कृति कुटिल, खले छले कर-जोर।।

कशिश तमन्ना में रहे, कोशिश कर भरपूर।
लक्ष्य मिले अथवा नही, अनुभव मिले जरूर।।

पढ़ौ वेद नाहीं सखा, साधौ मंतर आज। 
पढ़ौ वेदना हीं सखा, हरषै सकल समाज ||

नहीं घडी भर भी रहा, कभी कलाई थाम |
भेज कलाई की घडी, किन्तु किया बदनाम ||

नहीं हड्डियां जीभ में, किन्तु शक्ति भरपूर |
तुड़वा सकती हड्डियाँ, सुन रविकर मगरूर ||

भाँय भाँय करता भवन, लेकिन भाय न भाय ।
ले लुभाय ससुरारि जब, मैया भी भरमाय ॥

जब तन धन सत्ता समय, छोड़ें रविकर साथ।
तब स्वभाव सत्संग सच, समझ पकड़ ले हाथ।।

सॉरी सॉरी नित कहे, रविकर तो बेशर्म।
डॉक्टर सॉरी कह गया, है दस को दशकर्म।।
कुण्डली
बढ़िया घटिया पर बहस, बढ़िया जाए हार |
घटिया पहने हार को, छाती रहा उभार |
छाती रहा उभार, दूर की लाया कौड़ी  |
करे सटीक प्रहार, दलीले भौड़ी भौड़ी |
तर्कशास्त्र की जीत, हारता दिखे अगड़िया  |
घटिया घटिया रहे, तर्क से हारे बढ़िया ||

बोली, मैंने भी पढ़ी, शांता का प्रतिवाद |
वेद-भाष्य रिस्य सृंग का, कोई नहीं विवाद ||

कामी क्रोधी लालची, पाये बाह्य उपाय ।
उद्दीपक का तेज नित, इधर उधर भटकाय ।
इधर उधर भटकाय, कुकर्मों में फंस जाता ।
अहंकार का दोष, मगर अंतर से आता।
अंग राज्य अति-श्रेष्ठ, नहीं है नारि विरोधी ।
पद मद में हो चूर, बना यह कामी क्रोधी ।।

कुण्डली

भीषण गर्मी से थका, मन-चंचल तन-तेज |
भीग पसीने से रही, मानसून अब भेज |
मानसून अब भेज, धरा धारे जल-धारा |
जीव-जंतु अकुलान, सरस कर सहज नजारा |
भूतल शीतल भाव, दिखाओ प्रभु जी नरमी |
यह तीखी सी धूप, थामिए भीषण गरमी ||

कुण्डली
 सावन भी भाये नहीं, मन दारुण तड़पाय ।
मन का पंछी दूर तक, उड़ उड़ वापस आय ।
  उड़ उड़ वापस आय, स्वाँस यादें गम लाती ।
सुन गोरी चितलाय, झूल सावन जो गाती ।
भीगे भीगे शब्द, करे  यादों को पावन ।
रहा अधर में झूल, भीगता सूखा सावन ।।

कुण्डली
गरज हमारी देख के,  गरज-गरज घन खूब ।
बिन बरसे वापस हुवे, धमा-चौकड़ी ऊब ।
धमा-चौकड़ी ऊब, खेत-खलिहान तपे हैं ।
तपते सड़क मकान, जीव भगवान् जपे है ।
त्राहिमाम भगवान् , पसीना छूटे भारी ।
भीगे ना अरमान, भीगती गरज हमारी ।।

कुण्डली
सात्विक-जिद से आसमाँ, झुक जाते भगवान् ।
पीर पराई बाँट के, धन्य होय इंसान ।
धन्य होय इंसान, मिलें दुर्गम पथ अक्सर ।
 हों पूरे अरमान, कोशिशें कर ले बेहतर ।
बाँट एक मुस्कान, मिले तब शान्ति आत्मिक ।
दीदी धन्य विचार, यही तो शुद्ध सात्विक ।।

08 June, 2017

काव्य शक्ति-सम्पन्न तो, कवि को भूले कौन


खले मूढ़ की वाह तब, समझदार जब मौन।
काव्य शक्ति-सम्पन्न तो, कवि को भूले कौन।।

कह के कविता की कमी, कन्नी काटें आप।
कवि सुधार जो कर सके, रहे बैठ चुपचाप।।


ये तन धन सत्ता समय, छोड़ें रविकर साथ।
सच स्वभाव सत्संग सह, समझ पकड़ ले हाथ।।

सॉरी सॉरी नित कहे, रविकर तो बेशर्म।
डॉक्टर सॉरी कह गया, है दस को दशकर्म।।

मेह मान मेहमान को, कर स्वागत-सत्कार।
होय न जब तक तर-बतर, रविकर नही नकार।।

चाय नही पानी नही, पीता अफसर आज।
किन्तु चाय-पानी बिना, करे न कोई काज।।

दिनभर पत्थर तोड़ के, करे नशा मजदूर।
रविकर कुर्सी तोड़ता, दिखा नशे में चूर।।

सरसराय शर सास के, खींचे बहू कमान।
चल चुपके से ले निकल, बड़ी कीमती जान।।

नहीं समय पर थी समझ, अंधकार था व्याप्त।
लेकिन जब आई समझ, रविकर समय समाप्त।।

रख कर आले पर अकल, घर में वक्त गुजार।
पर रविकर लेकर निकल, बेढब बड़ा-बजार।।

करे नहीं गलती कभी, बड़ा तजुर्बेकार।
किन्तु तजुर्बे के लिए, की गलतियां हजार।।

अवसादी, निंदित हुआ, रविकर ख्वाब खराब।
चुन ले आशा कर क्षमा, देख दुबारा ख्वाब।।

गर्मी खून जुनून की, आज निकाले जून।
मानसून ही दे सके, अब तो शीत- सुकून।।

जले खेत-जल लू चले, है साँसत में जान।
जब वीयर पीते धनी, खोजे जहर किसान।।

दर्पण जैसे दोस्त की, यदि पॉलिस बदरंग।
रविकर छोड़े शर्तिया, परछाईं भी संग।

जैसे गोला-बर्फ का, रिश्ता लिया बनाय।
रविकर शीतलता बिना, लेकिन यह गल जाय।।

छूकर निकली जिन्दगी, सिहरे रविकर लाश।
जख्म हरे फिर से हुए, फिर से शुरू तलाश।।

दिल में पलते स्वप्न फिर, कैसे हों साकार |
शंका यदि विश्वास पर, हर कोशिश बेकार ||

कर ले रविकर दिल बड़ा, सुनकर छोटी बात।
यद्यपि दुनिया चिड़चिड़ा, करे घात-प्रतिघात।।

लगे कठिन यदि जिंदगी, उसको दो आवाज।
करो नजर-अंदाज कुछ, बदलो कुछ अंदाज।।

युद्ध महाभारत छिड़ा, बटे गृहस्थ पदस्थ।
लड़े शिखण्डी भी जहाँ, अवसरवाद तटस्थ।।

रविकर गौमाता कटे, भारत माता खिन्न।
यदा कदा कटते रहे, जिसके अंग विभिन्न।।

दूध फटे तो चाय बिन, बढ़ जाता सरदर्द।
गाय कटे तो जश्न में, शामिल हों नामर्द।।

सबको देता अहमियत, ले हाथों में हाथ।
बुरे सिखा जाते सबक, भले, भले दें साथ।।

जर्जर थुन्नी-धन्नियाँ, रविकर छत दीवार।
चुका चुका भाड़ा अगर, चल हो जा तैयार।

जर्जर होते जा रहे, पल्ला छत दीवार।
खोज रहा घर दूसरा, रविकर सागर पार।।।।

लेडी-डाक्टर खोजता, पत्नी प्रसव समीप।
बुझा बहन का जो चुका, रविकर शिक्षा-दीप।।

गिरे स्वास्थ्य दौलत गुमे, विद्या भूले भक्त।
मिले वक्त पर ये पुन:, मिले न खोया वक्त।।

कभी सुधा तो विष कभी, मरहम कभी कटार।
आडम्बर फैला रहे, शब्द विभिन्न प्रकार।।

04 June, 2017

रविकर शिक्षा में नकल, देगा मिटा वजूद-


करे नहीं परमाणु बम, राष्ट्र नेस्तनाबूद।
रविकर शिक्षा में नकल, देगा मिटा वजूद।
देगा मिटा वजूद, भवन-पुल गिरे भरभरा।
अर्थ-न्याय-विधि आदि, व्यवस्था जाय चरमरा।
हो यदि शिक्षा ध्वस्त, राष्ट्र फिर कैसे निखरे।
मानवता मर जाय, कसे फिर दुनिया फिकरे ।

21 May, 2017

दोहे

कर रविकर अहसास तो, बने अजनबी खास।
अपने भी हों अजनबी, मरे अगर अहसास।।

मैया तो पाला करे, रविकर श्रवण कुमार।
पाला बदले किन्तु सुत, बदले जब सरकार।।

मैया है मेरी हँसी, बापू की मुस्कान।
छुटकी की शैतानियाँ, रविकर कुल सम्मान।।

साहस तो देती मगर, छीन रही पहचान।
बाहर निकलो भीड़ से, रहो न भेड़ समान।।

आँख मूँद कर कौन कब, सका मुसीबत टाल।
उल्टा आँखे खोल दे, रविकर आपद्काल।।

दिखे परस्पर आजकल, जलते तपते लोग।
जले-तपे धरती तभी, लू-लपटें ले भोग।।

करे कदर कद देख के, जहाँ मूर्ख इन्सान।
निरंकार प्रभु को भला, ले कैसे पहचान।।

दुर्जन पर विश्वास कर, पाई थोड़ी पीर।
सज्जन पर शंका किया, पूरा दुखा शरीर।।

ऊँट समस्या सम खड़े, रविकर बीच बजार।
खुद बैठे, बैठा दिए, फिर भी बाकी चार।।

अहमक तो दीमक सरिस, गया किताबें चाट।
अहम् बढ़ा पर अक्ल ने, खोले नही कपाट।।

रविकर रोने के लिए, मिले न कंधा एक।
चार चार कंधे मिले, बिलखें आज अनेक।।

भूमि उर्वरा वायु जल, पौध-पुत्र अनुकूल।
किन्तु छाँह में ये कभी, सके नहीं फल-फूल।।

भेड़-चाल जनता चले, खले मुफ्त की मार।
सत्ता कम्बल बाँट दे, उनका ऊन उतार।।

रहे बाँटते आज तक, जो रविकर की पीर।
चलो खींच लें साथ में, यादगार तस्वीर।।

नीयत रखो सुथार की, करो भूल स्वीकार।
इन भूलों से शर्तिया, होगा बेड़ापार।।

रविकर रिश्तों के लिए, नित्य निकालो वक्त।।
इन रिश्तों से अन्यथा, कर दे वक्त विरक्त।।

धनी पकड़ ले बिस्तरा, लगे घूरने गिद्ध।
लें वकील को वे बुला, वैद्य प्रवेश निषिद्ध।।

कण कण में जब प्रभु बसे, क्यूँ तू मंदिर जाय।
पवन धूप में भी चले, पर छाया में भाय।।

सुख दुख निन्दा अन्न यदि, रविकर लिया पचाय।
पाप निराशा शत्रुता, चर्बी से बच जाय।।

अपनी गलती पर बने, रविकर अगर वकील।
जज बन के खारिज़ करे, पत्नी सभी दलील।।

प्रीति-पीर पर्वत सरिस, हिमनद सा नासूर।
रविकर की संजीवनी, रही दूर से घूर।।

जीवन-नौका तैरती, भव-सागर विस्तार।
लोभ-मोह सम द्वीप दस, रोक रहे पतवार।।

कुटिया में कोदौं पके, ले मुस्टंडे घेर।
महलों में कुत्ते फिरें, कहें उन्हें वे शेर।।

किया बुढ़ापे के लिए, जो लाठी तैयार।
मौका पाते ही गयी, वो तो सागर पार।

रविकर पल्ला झाड़ दे, देख दीन मेह`मान।
लेकिन पल्ला खोल दे, यदि आये धनवान।

वैसे तो टेढ़े चलें, कलम शराबी सर्प।
पर घर में सीधे घुसें, छोड़ नशा विष दर्प।।

अधिक मिले पहले मिले, किस्मत वक्त नकार।
इसी लालसा में गये, रविकर के दिन चार।।

दीन कुटुम्बी से लिया, रविकर पल्ला झाड़।
खोले पल्ला गैर हित, गाँठ-गिरह को ताड़।।

रविकर की पाचन क्रिया, सचमुच बड़ी विचित्र।
रुपिया पैसा ले पचा, परेशान हैं मित्र।।😁😁