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21 May, 2017

दोहे

कर रविकर अहसास तो, बने अजनबी खास।
अपने भी हों अजनबी, मरे अगर अहसास।।

मैया तो पाला करे, रविकर श्रवण कुमार।
पाला बदले किन्तु सुत, बदले जब सरकार।।

मैया है मेरी हँसी, बापू की मुस्कान।
छुटकी की शैतानियाँ, रविकर कुल सम्मान।।

साहस तो देती मगर, छीन रही पहचान।
बाहर निकलो भीड़ से, रहो न भेड़ समान।।

आँख मूँद कर कौन कब, सका मुसीबत टाल।
उल्टा आँखे खोल दे, रविकर आपद्काल।।

दिखे परस्पर आजकल, जलते तपते लोग।
जले-तपे धरती तभी, लू-लपटें ले भोग।।

करे कदर कद देख के, जहाँ मूर्ख इन्सान।
निरंकार प्रभु को भला, ले कैसे पहचान।।

दुर्जन पर विश्वास कर, पाई थोड़ी पीर।
सज्जन पर शंका किया, पूरा दुखा शरीर।।

ऊँट समस्या सम खड़े, रविकर बीच बजार।
खुद बैठे, बैठा दिए, फिर भी बाकी चार।।

अहमक तो दीमक सरिस, गया किताबें चाट।
अहम् बढ़ा पर अक्ल ने, खोले नही कपाट।।

रविकर रोने के लिए, मिले न कंधा एक।
चार चार कंधे मिले, बिलखें आज अनेक।।

भूमि उर्वरा वायु जल, पौध-पुत्र अनुकूल।
किन्तु छाँह में ये कभी, सके नहीं फल-फूल।।

भेड़-चाल जनता चले, खले मुफ्त की मार।
सत्ता कम्बल बाँट दे, उनका ऊन उतार।।

रहे बाँटते आज तक, जो रविकर की पीर।
चलो खींच लें साथ में, यादगार तस्वीर।।

नीयत रखो सुथार की, करो भूल स्वीकार।
इन भूलों से शर्तिया, होगा बेड़ापार।।

रविकर रिश्तों के लिए, नित्य निकालो वक्त।।
इन रिश्तों से अन्यथा, कर दे वक्त विरक्त।।

धनी पकड़ ले बिस्तरा, लगे घूरने गिद्ध।
लें वकील को वे बुला, वैद्य प्रवेश निषिद्ध।।

कण कण में जब प्रभु बसे, क्यूँ तू मंदिर जाय।
पवन धूप में भी चले, पर छाया में भाय।।

सुख दुख निन्दा अन्न यदि, रविकर लिया पचाय।
पाप निराशा शत्रुता, चर्बी से बच जाय।।

अपनी गलती पर बने, रविकर अगर वकील।
जज बन के खारिज़ करे, पत्नी सभी दलील।।

प्रीति-पीर पर्वत सरिस, हिमनद सा नासूर।
रविकर की संजीवनी, रही दूर से घूर।।

जीवन-नौका तैरती, भव-सागर विस्तार।
लोभ-मोह सम द्वीप दस, रोक रहे पतवार।।

कुटिया में कोदौं पके, ले मुस्टंडे घेर।
महलों में कुत्ते फिरें, कहें उन्हें वे शेर।।

किया बुढ़ापे के लिए, जो लाठी तैयार।
मौका पाते ही गयी, वो तो सागर पार।

रविकर पल्ला झाड़ दे, देख दीन मेह`मान।
लेकिन पल्ला खोल दे, यदि आये धनवान।

वैसे तो टेढ़े चलें, कलम शराबी सर्प।
पर घर में सीधे घुसें, छोड़ नशा विष दर्प।।

अधिक मिले पहले मिले, किस्मत वक्त नकार।
इसी लालसा में गये, रविकर के दिन चार।।

दीन कुटुम्बी से लिया, रविकर पल्ला झाड़।
खोले पल्ला गैर हित, गाँठ-गिरह को ताड़।।

रविकर की पाचन क्रिया, सचमुच बड़ी विचित्र।
रुपिया पैसा ले पचा, परेशान हैं मित्र।।😁😁

14 May, 2017

दोहे

गली गली गाओ नहीं, दिल का दर्द हुजूर।
घर घर मरहम तो नही, मिलता नमक जरूर।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, चोटी पर अरमान।
रविकर झुक के यदि चढ़ो, हो चढ़ना आसान।।

टका टके से मत बदल, यह विनिमय बेकार ।
दो विचार यदि लो बदल, होंगे दो दो चार।।

भर दिन पैदल चल पिता, ले सौ टका बचाय।
रविकर दिन लेता बचा, पाँच हजार उड़ाय।।

बदले मौसम सम मनुज, वर्षा गर्मी शीत।
रंग-ढंग बदले गजब, गिरगिटान भयभीत।।

साँस खतम हसरत बचे, रविकर मृत्यु कहाय।
साँस बचे हसरत खतम, मनुज मोक्ष पा जाय।।

शत्रु छिड़क देता नमक, मित्र छिड़कता जान।
बड़े काम का घाव प्रिय, हुई जान-पहचान।।

साल रही रविकर कमी, प्रस्तुत एक मिसाल।
संग साल दर साल रह, कहे न दिल का हाल।।

रविकर तरुवर सा तरुण, दुनिया भुगते ऐब।
एक डाल नफरत फरत, दूजे फरे फरेब।
 
पूरे होंगे किस तरह, कहो अधूरे ख्वाब।
सो जा चादर तान के, देता चतुर जवाब।।

बड़ी सरलता से उसे, देते आप हराय।
जीत सकोगे क्या कभी, बोलो रविकर भाय।।

शब्दाडंबर पर आपके, भारी मेरा मौन।
लेकिन दोनो हारते, बोलो जीता कौन।।

सर्दी में जल काटता, वर्षा जल से बाढ़।
गर्मी से बेहाल जल, खीस बैठ के काढ़।।

गर मीसे अंबिया पकी, पना बना पी जाय।
गरमी से बेहाल तन, रविकर राहत पाय।।

खरी बात कड़ुवी दवा, रविकर मुंह बिचकाय ।
खुशी खुशी तू कर ग्रहण, ग्रहण व्याधि हट जाय।।

जब पीकर कड़ुवी दवा, मुँह बिचकाये बाल।
खरी बात सुन कै करें, बड़े लोग तत्काल।

माँसाहारी का बदन, रविकर कब्रिस्तान।
हरदिन कर मुर्दे दफन, फिर भी बाकी स्थान।।

कई छोड़कर के गये, सहकर के अपमान ।
निभा रहा रिश्ता मगर, रविकर मन नादान।।

07 May, 2017

दोहे -

फूँक मारके दर्द का, मैया करे इलाज।
वह तो बच्चों के लिए, वैद्यों की सरताज।

चक्षु-तराजू तौल के, भार बिना पासंग।
हल्कापन इन्सान का, देख देख हो दंग।।

बेमौसम ओले पड़े, चक्रवात तूफान।
धनी पकौड़ै खा रहे, खाये जहर किसान।।

चुरा सका कब नर हुनर, शहद चुराया ढेर।
मधुमक्खी निश्चिंत है, छत्ता नया उकेर।।

हर मकान में बस रहे, अब तो घर दो चार।
पके कान दीवार के, सुन सुन के तकरार।।

सीधे-साधे को सदा, सीधे साधे व्यक्ति।
टेढ़े-मेढ़े को मगर, साधे रविकर शक्ति।।

जार जार रो, जा रही, रोजा में बाजार।
रोजाना गम खा रही, सही तलाक प्रहार।।

छलके अपनापन जहाँ, रविकर रहो सचेत।
छल के मौके भी वहीं, घातक घाव समेत।।

पल्ले पड़े न मूढ़ के, मरें नहीं सुविचार।
समझदार समझे सतत्, चिंतक धरे सुधार।।

मृग-मरीचि की लालसा, घुटने पे दौड़ाय।
दम घुटने से अक्ल भी, घुटने में मर जाय।।

असफलता फलते फले, जारी रख संघर्ष।
दोनों ही तो श्रेष्ठ गुरु, कर वन्दना सहर्ष।।

कभी सुधा तो विष कभी, मरहम कभी कटार।
आडम्बर फैला रहे, शब्द विभिन्न प्रकार।।


मेरे मोटे पेट से, रविकर-मद टकराय।
कैसे मिलता मैं गले, लौटा पीठ दिखाय।।

30 April, 2017

सरहद पर भारी पड़े, महबूबा का प्यार।

दोहे 
रोज शत्रु उकसा रहा, फिकरे कसे विपक्ष।
कहो युधिष्ठिर मौन क्यूँ, रविकर यक्ष समक्ष।।

मोदी सर हद से अधिक, ढीलापन बेकार।
सरहद पर भारी पड़े, महबूबा का प्यार।।

महबूबा के इश्क में, हरदिन पत्थर खाय।
दीवाना पागल हुआ, मैया करो उपाय।।

कुंडलियां 

पलटन पैलटगन बिना, हो जाती असहाय।
नहीं पलटना जानती, बरबस पत्थर खाय।
बरबस पत्थर खाय, पलटना नेता जाने।
छप्पन इंची वक्ष, बनाये नये बहाने।
रविकर गन पर रोक, रोष में सारा जन गन।
मरें शिविर में वीर, मर्सिया गाये पलटन।।

धोखे से मारा करे, प्रतिद्वन्दी बरबंड।
घुसे कबड्डी बोलकर, करे खेल फिर भंड।
करे खेल फिर भंड, फिदाइन फाउल खेले।
मिले न लेकिन दंड, दंड वो धर धर पेले।
रक्तबीज उत्पन्न, कालिका खप्पर सोखे।
बचे नहीं अब दुष्ट, बहुत खायें हैं धोखे।।

19 March, 2017

चक्का योगी का चले-


Yogi Adityanath
(1)

योगी मोदी अटल जी, क्वाँरे करते राज।
राहुल पर करते तभी, ये कांग्रेसी नाज।
ये काँग्रेसी नाज, ताज पर नही मिला है।
मिटे न रविकर खाज, आत्मविश्वास हिला है।
मनोकामना पूर्ण, कहाँ शिव-गौरी होगी।
मोदी मोदी तत्र, अत्र अब योगी योगी।।
(2)
सकते में है दुष्टता, किंकर्तव्य-विमूढ़ ।
सज्जनता हर्षित दिखे, योगी सत्तारूढ़।
योगी सत्तारूढ़, भाग्य भारत के जागे।
भेदभाव-भय भूल, बढ़ेगा यू पी आगे।
गेरुवा कपड़ा देख, साँढ़ तो रहे बिदकते।
एक घाट पर जीव, किन्तु पानी पी सकते।।

(3)

चक्का योगी का चले, चक्का चले महेश।

केशव चक्का भी बढ़े, अॉटो रिक्शा पेश।
अॉटो रिक्शा पेश, बड़ा मजबूत बनाया।
उत्तम बने प्रदेश, रेस क्या खूब लगाया।
अनाचार भय भूख, खड़ा है हक्का बक्का।
भागा भ्रष्टाचार, वक्त का चलता चक्का।।

(4)

ढोंगी पाखण्डी डरे, मरे लुटेरे चोर।

सत्ता अलबत्ता कहे, हुई नही है भोर।
हुई नही है भोर, रात अब बीत रही है।
सज्जन रहे अगोर, यही तो वक्त सही है।
चमक रहा आदित्य, नाथ यू पी का योगी।
माँ को डायन बोल, बचे क्या आजम ढोंगी।।


डोरे डाले डाकिनी, मनभावन मुस्कान |
आलिंगन चुम्बन करे, ले ले लेकिन जान |
ले ले लेकिन जान, जान गठबंधन पक्का |
दे हरिनाम विसार, जमाना हक्का बक्का |
कर सोलह श्रृंगार, सवेरे खीस निपोरे |

फिर रविकर को मार, डालती फिर-फिर डोरे ||