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08 January, 2018

जिन्दगी के दोहे

भँवर सरीखी जिंदगी, हाथ-पैर मत मार।
देह छोड़, दम साध के, होगा बेडा पार ।।

चार दिनों की जिन्दगी, बिल्कुल स्वर्णिम स्वप्न।
स्वप्न टूटते ही लुटे, देह नेह धन रत्न।।

प्रश्न कभी गुत्थी कभी, कभी जिन्दगी ख्वाब।
सुलझा के साकार कर, रविकर खोज जवाब।।

रस्सी जैसी जिंदगी, तने तने हालात |
एक सिरे पे ख्वाहिशें, दूजे पे औकात ||

सकते में है जिंदगी, दिखे सिसकते लोग | 
भाग भगा सकते नहीं, आतंकी उद्योग ||

असफल जीवन पर हँसे, रविकर धूर्त समाज।
किन्तु सफलता पर यही, ईर्ष्या करता आज।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, चोटी पर अरमान।
रविकर झुक के यदि चढ़ो, हो चढ़ना आसान।।

इम्तिहान है जिन्दगी, दुनिया विद्यापीठ।
मिले चरित्र उपाधि ज्यों, रंग बदलते ढीठ।।

छूकर निकली जिन्दगी, सिहरे रविकर लाश।
जख्म हरे फिर से हुए, फिर से शुरू तलाश।।

जी जी कर जीते रहे, जग जी का जंजाल।
जी जी कर मरते रहे, जीना हुआ मुहाल।।

लगे कठिन यदि जिंदगी, उसको दो आवाज।
करो नजर-अंदाज कुछ, बदलो कुछ अंदाज।।

दुख में जीने के लिए, तन मन जब तैयार।
छीन सके तब कौन सुख, रविकर से हरबार।।

जीवन की संजीवनी, हो हौंसला अदम्य |
दूर-दृष्टि, प्रभु की कृपा, पाए लक्ष्य अगम्य ॥ 





14 December, 2017

लल्ली लगा ली आलता लावा उछाली चल पड़ी

अलमारियों में पुस्तकें सलवार कुरते छोड़ के।
गुड़िया खिलौने छोड़ के, रोये चुनरियाओढ़ के।
रो के कहारों से कहे रोके रहो डोली यहाँ।
माता पिता भाई बहन को छोड़कर जाये कहाँ।
लख अश्रुपूरित नैन से बारातियों की हड़बड़ी।
लल्ली लगा ली आलता लावा उछाली चल पड़ी।।

हरदम सुरक्षित वह रही सानिध्य में परिवार के।
घूमी अकेले कब कहीं वह वस्त्र गहने धार के।
क्यूँ छोड़ने आई सखी, निष्ठुर हुआ परिवार क्यों।
अन्जान पथ पर भेजते अब छूटता घर बार क्यों।।
रोती गले मिलती रही, ठहरी नही लेकिन घड़ी।
लल्ली लगा ली आलता लावा उछाली चल पड़ी।।

आओ कहारों ले चलो अब अजनबी संसार में।
शायद कमी कुछ रह गयी है बेटियों के प्यार में।
तुलसी नमन केला नमन बटवृक्ष अमराई नमन।
दे दो विदा लेना बुला हो शीघ्र रविकर आगमन।।
आगे बढ़ी फिर याद करती जोड़ती इक इक कड़ी।
लल्ली लगा ली आलता लावा उछाली चल पड़ी।।

11 December, 2017

जिन्हें थी जिंदगी प्यारी, बदल पुरखे जिए रविकर-

(1)
विदेशी आक्रमणकारी बड़े निष्ठुर बड़े बर्बर |
पराजित शत्रु की जोरू-जमीं-जर छीन लें अकसर |
कराओ सिर कलम अपना, पढ़ो तुम अन्यथा कलमा  
जिन्हें थी जिंदगी प्यारी, बदल पुरखे जिए रविकर ||

(2)
उमर मत पूछ औरत की, बुरा वह मान जायेगी।
मरद की आय मत पूछो, उसे ना बात भायेगी।
फिदाइन यदि मरे मारे, मियाँ तुम मौन रह जाना।
धरम यदि पूछ बैठे तो, सियासत जान खायेगी।।

(3)
मदर सा पाठ लाइफ का पढ़ाता है सिखाता है।
खुदा का नेक बन्दा बन खुशी के गीत गाता है।
रहे वह शान्ति से मिलजुल, करे ईमान की बातें
मगर फिर कौन हूरों का, उसे सपना दिखाता है।।

04 December, 2017

हाहा हहा क्या बात है। हालात् है।।

दरमाह दे दरबान को जितनी रकम होटल बड़ा।
परिवार सह इक लंच में उतनी रकम दूँ मैं उड़ा।
हाहा हहा क्या बात है। उत्पात है।

तौले करेला सेब आलू शॉप पर छोटू खड़ा।
वह जोड़ना जाने नहीं, यह जानकर मैं हँस पड़ा।
हाहा हहा क्या बात है। औकात है।।

जब शार्ट्स ब्रांडेड फाड़कर घूमे फिरे हीरोइने।
तो क्यों गरीबी बेवजह अंगांग लगती ढापने।
हाहा हहा क्या बात है। क्या गात है।।

जब जात पर जब पात पर जब धर्म पर जनगण बँटा।
तब दाँव अपना ताड़के नेता बना रविकर डटा।
हाहा हहा क्या बात है। हालात् है।।

30 November, 2017

मनाओ मूर्ख अधिकारी, अधिक सम्मान दे करके

अपेक्षा मत किसी से रख, किसी की मत उपेक्षा कर ।
सरलतम मंत्र खुशियों का, खुशी से नित्य झोली भर।
समय अहसास बदले ना, बदलना मत नजरिया तुम
वही रिश्ते वही रास्ता वही हम सत्य शिव सुंदर।।

आलेख हित पड़ने लगे दुर्भाग्य से जब शब्द कम।
श्रुतिलेख हम लिखने लगे, नि:शब्द होकर के सनम। 
तुम सामने मनभर सुना, दिल की सुने बिन चल गयीं
हम ताकते ही रह गये, अतिरेक भावों की कसम।।

अकेले बोल सकते हो मगर वार्त्ता नहीं मुमकिन।
अकेले खुश रहे लेकिन मना उत्सव कहाँ तुम बिन।
दिखी मुस्कान मुखड़े पर मगर उल्लास गायब है
तभी तो एक दूजे की जरूरत पड़ रही हरदिन।।

बड़ी तकलीफ़ से श्रम से, रुपैया हम कमाते हैं ।
उसी धन की हिफाज़त हित बड़ी जहमत उठाते हैं।
कमाई खर्चने में भी, निकलती जान जब रविकर 
कहो फिर जिंदगी को क्यों कमाने में खपाते हैं।।

मनाओ मूर्ख अधिकारी, अधिक सम्मान दे करके।
अगर लोभी प्रशासक है, मनाओ दान दे करके।
प्रशासक क्रूर यदि मिलता, नमन करके मना लेना।
मगर विद्वान अफसर को, हकीकत सब बता देना।।