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24 July, 2017

पसारे हाथ जाता वो नहीं सुख-शान्ति पाया है


पतन होता रहा फिर भी बहुत पैसा कमाया है ।

किया नित धर्म की निन्दा, तभी लाखों जुटाया है।
सहा अपमान धन खातिर, अहित करता हजारों का
पसारे हाथ जाता वो नहीं सुख-शान्ति पाया है।।

वहीं विद्वान शंका में, हमेशा मार खाते हैं


बड़ी बेचैन लगती है, परेशानी उठाती है।

बता री जिन्दगी कैसे, समय अपना बिताती है।
विचारों का लगे ताँता, तभी तो नींद उड़ जाती।
नसीबा सो रहा रविकर, जगाने मौत आती है।।



नित फोड़ कर दो नारियल हर-हर करूँ बम-बम करूँ।

सुख-शान्ति पा बम-बम रहूँ, फिर भी सदा बम से डरूँ।
तुम फोड़ते घातक पटाखे, बम कमर में बाँध के।
पाते बहत्तर हूर तुम, यह मामला क्या है गुरू।।



अकारण ही करे कोई अगर निंदा, पचा प्यारे।

बढ़ेंगे अन्यथा दुश्मन, करेंगे फिर दुखी सारे।
पचे दुख सुख पचे भोजन तभी कल्याण हो रविकर।
खले क्रमशः निराशा पाप चर्बी अन्यथा बढ़कर।।



चुरा के छाप छोड़ें वे हजारों मंच भी जीते।

चुरा ले आँख का काजल, इसी में वक्त कुल बीते।
बड़े बाजार में बेचा शहद खा के चुरा कर के।
रहे बेफिक्र मधुमक्खी मगर छत्ता पुनः भर के।।



हरे हों जख्म या सूखे कभी जग को दिखाना मत।

गली-कूँचे नगरपथ पर कभी निज दर्द गाना मत।
मिले मरहम नहीं घर में, मगर मिलते नमक-मिर्ची।
बचा दामन निकल रविकर, कभी आँसू बहाना मत।।



समस्याग्रस्त दुनिया की, समस्या जो बढ़ाते हैं।

यहीं फिलहाल ठहरो तुम, अभी उनसे मिलाते हैं।
जहाँ कुछ मूढ़ रविकर से, बने अति-आत्मविश्वासी
वहीं विद्वान शंका में, हमेशा मार खाते हैं।।

मेरा परिचय


आजादी दिन साठ का, सरयू जी के तीर।
पटरंगा में जन्मता, नश्वर मनुज शरीर।।

इंस्ट्रक्टर के रूप में, कर्मक्षेत्र धनबाद।
झाँसी चंडीगढ़ रहा, रहा अयोध्या याद।

आई आई टी बना, अब मेरा संस्थान।
रचूँ लोकहित छंद शुभ, शेष यही अरमान।
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धर्मपत्नी मिली सीमा मिली फिर तीन सन्तानें।
शिवा मनु स्वस्ति तीनों ही स्वयं का सत्य पहचाने।
पढ़े प्रौद्यौगिकी तीनों बढ़े प्रतियोगिता कर कर।
प्रतिष्ठित आज तीनों हैं पढ़ाई पूर्ण कर रविकर।।
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वर्णों का आंटा गूँथ-गूँथ, 
शब्दों की टिकिया गढ़ता हूँ| 
समय-अग्नि में दहकाकर, फिर
मद्धिम-मद्धिम तलता हूँ||

चढ़ा चासनी भावों की, 
ये शब्द डुबाता जाता हूँ | 
गरी-चिरोंजी अलंकार से,
फिर क्रम वार सजाता हूँ ||

18 July, 2017

किसानों ने मगर बरसात में केवल जहर खाया

विधाता छंद
नहीं पीता कभी पानी, रियाया को पिलाता है।
नकारा चाय भी अफसर, नकारा जान खाता है।
नहीं वह चाय का प्यासा, कभी पानी नहीं मांगे 
मगर बिन चाय-पानी के, नहीं फाइल बढ़ाता है।।

चुनावी हो अगर मौसम बड़े वादे किये जाते।
कई पूरे किये जाते कई बिसरा दिए जाते।
किया था भेड़ से वादा मिलेगा मुफ्त में कम्बल
कतर के ऊन भेड़ो का अभी नेता लिये जाते।।

फटे बादल चढ़ी नदियाँ बहे पुल जलजला आया।
कटे सम्पर्क गाँवों का बटे राहत नहीं पाया।
अमीरों की रसोई में पकौड़े तल रहे नौकर।
किसानों ने मगर बरसात में केवल जहर खाया ।।

उमर मत पूछ औरत की, बुरा वह मान जायेगी।
मरद की आय मत पूछो, उसे ना बात भायेगी।
फिदाइन यदि मरे मारे, मियाँ तुम मौन रह जाना।
धरम यदि पूछ बैठे तो, सियासत जान खायेगी।।

समाया सोच में ही पाप, जो संताप देता है ।
रहा निष्पाप मानव-तन मगर खुद दोष लेता है।
किया तन शुद्ध पानी में कई डुबकी लगा कर के |
मगर यह सोच कैसे शुद्ध हो गंगा नहा कर के ||

16 July, 2017

पतन हो किन्तु यदि रविकर स्वयं का दोष तो मानो


गुलामी गैर करवाता बजा तू हुक्म आका का।
पराजय दूसरे दें दोष थोड़ा सा लड़ाका का।
सदा दुख दर्द दूजे दें तुम्हारा भाग्य तुम जानो ।
पतन हो किन्तु यदि रविकर स्वयं का दोष तो मानो।।



दवा लाने दवाखाने पिता हर पाख जाते हैं।
हुई गठिया गयी बिटिया बड़ी तकलीफ पाते हैं ।
बढ़े पीड़ा कदम भारू मगर फिर भी उठाते हैं।
उधर बेटे लिए डॉगी सुबह वाकिंग कराते हैं।।



डरपोक होना सर्प का कल्याणकारी है सदा।
आलस्य भारी सिंह का टाले मनुज की आपदा।
पंडित नहीं जो एक मत, फतवे नहीं जारी हुए।
कारण यही महफूज है संसार रविकर सर्वदा।।



प्रात: निकलती जिन्दगी पैसा कमाने के लिए।
पर शांति खोजे शाम को आराम पाने के लिए।।
बस कर्म करते जाइये पूजा यही भगवान की।
कुछ दान करने के लिए खाने खिलाने के लिए।।



विधाता छंद
(1)
सियासत खेल करती है सिया वनवास जाती है।
परीक्षा नारि ही देती पुरुष को शर्म आती है।
अगर है सुपनखा कोई उसे नकटा बना देते।
सिया एवं सती को फिर सियासत में फँसा देते।।
(2)
जला के वे दिया अपना बुझाते तीलियाँ झट से।
निकलता काम ज्यों ही वे मिटा देते पटक फट से।
यही दस्तूर दुनिया का सितम करता रहा रविकर।
बुझाकर प्यास कुल्हड़ को गये वे फेंक कर पथ पर।।

(३)

किसी का स्वास्थ्य गिर जाये, दुबारा पुष्ट हो काया।
कभी दौलत गुमे रविकर, मिले फिर से महामाया।
भुला जाये अगर विद्या, दुबारा सीख सकते हो
मगर जब वक्त खोया तो, कहाँ फिर वक्त वह आया।।