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28 November, 2012

रचवायें शुभ-काव्य, क्षमा मांगे अघ-रविकर




श्री राम की सहोदरी : भगवती शांता सर्ग-1 / 2/ 3

से 
 कुण्डली 

 रविकर नीमर नीमटर, वन्दे हनुमत नाँह ।
विषद विषय पर थामती, कलम वापुरी बाँह ।

कलम वापुरी बाँह, राह दिखलाओ स्वामी ।
बहन शांता श्रेष्ठ, मगर हे अन्तर्यामी ।

नहीं काव्य दृष्टांत, उपेक्षित त्रेता द्वापर ।
रचवायें शुभ-काव्य, क्षमा मांगे अघ-रविकर ।

 नीमटर=किसी विद्या को कम जानने वाला
नीमर=कमजोर   

 कुण्डली
मरने से जीना कठिन, पर हिम्मत न हार ।
 कायर भागे कर्म से, होय कहाँ उद्धार ?

होय कहाँ उद्धार, चलो पर-हित कुछ  साधें ।
 बनिए नहीं लबार, गाँठ जिभ्या पर बांधें ।

फैले रविकर सत्य, स्वयं पर जय करने से ।
 जियो लोक हित मित्र, मिले न कुछ मरने से ।  

 

 घनाक्षरी 
दीखते हैं मुझे दृश्य मनहर चमत्कारी
कुसुम कलिकाओं से वास तेरी आती है |

कोकिला की कूक में भी स्वर की सुधा सुन्दर
प्यार की मधुर टेर सारिका सुनाती है |

देखूं शशि छबि भव्य  निहारूं अंशु सूर्य की -
रंग-छटा उसमे भी तेरी ही दिखाती है |

कमनीय कंज कलिका विहस 'रविकर'
तेरे रूप-धूप का ही सुयश फैलाती है || 

3 comments:


  1. 28 NOVEMBER, 2012
    रचवायें शुभ-काव्य, क्षमा मांगे अघ-रविकर



    श्री राम की सहोदरी : भगवती शांता सर्ग-1 / 2/ 3
    से
    कुण्डली

    रविकर नीमर नीमटर, वन्दे हनुमत नाँह ।
    विषद विषय पर थामती, कलम वापुरी बाँह ।

    कलम वापुरी बाँह, राह दिखलाओ स्वामी ।
    बहन शांता श्रेष्ठ, मगर हे अन्तर्यामी ।

    नहीं काव्य दृष्टांत, उपेक्षित त्रेता द्वापर ।
    रचवायें शुभ-काव्य, क्षमा मांगे अघ-रविकर ।
    काव्य सौन्दर्य देखते ही बनता है इन पंक्तियों में .

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  2. कुण्डली
    मरने से जीना कठिन, पर हिम्मत न हार ।
    कायर भागे कर्म से, होय कहाँ उद्धार ?

    होय कहाँ उद्धार, चलो पर-हित कुछ साधें ।
    बनिए नहीं लबार, गाँठ जिभ्या पर बांधें ।

    फैले रविकर सत्य, स्वयं पर जय करने से ।
    जियो लोक हित मित्र, मिले न कुछ मरने से ।

    गिरधर जैसी कुंडली ,गिरधर जैसा बोध ,

    करले कितने भी जतन नहीं पायेगा शोध .

    बात रविकर की चलती ,

    गया गिरधर संग आगे ,सकल जग से है आगे .

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  3. कुण्डली
    मरने से जीना कठिन, पर हिम्मत न हार ।
    कायर भागे कर्म से, होय कहाँ उद्धार ?

    होय कहाँ उद्धार, चलो पर-हित कुछ साधें ।
    बनिए नहीं लबार, गाँठ जिभ्या पर बांधें ।

    फैले रविकर सत्य, स्वयं पर जय करने से ।
    जियो लोक हित मित्र, मिले न कुछ मरने से ।

    लिखे सौदेश्य कुंडली ,रविकर कहलाये ,

    बड़ों बड़ों को ये बहलाए .

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