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28 June, 2013

नष्ट हुवा घर-ग्राम कुटी जब क्रोध करे दल बादल देवा -

सवैया -
(1)
बाँध बनावत हैं सरकार वहाँ पर मूर्ति हटावत त्यूँ |

गान्धि सरोवर हिंसक हो मलबा-जल ढेर बहावत क्यूँ |

शंकर नेत्र खुला तिसरा करते धरती पर तांडव ज्यूँ |

धारिणि धारि महाकलिका कर धारण खप्पर मारत यूँ |


(2)
नष्ट हुवा घर-ग्राम कुटी जब क्रोध करे दल बादल देवा |

कष्ट बढ़ा गतिमान नदी करती कलिका किलकार कलेवा |

दूर रहे सरकार जहाँ बस खाय रही कुरसी-कर-मेवा |

हिम्मत से तब फौज डटी इस आफत में करती जन-सेवा ||

6 comments:

  1. यथास्थिति का साक्षात कराते सवैये ......... कवि ह्रदय हर स्थिति में द्रवित हो उठता है। उसके लिए क्या रासलीला क्या विनाश लीला!

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  2. लील लिया सब देस सरोवर गांधिपना चिर आफत है।

    यूज़र वा सर हो समभाव यही उनकी न शराफत है।

    मंदिर मूरत देत हटाय यही 'सिक कूलर' चाहत है।

    यों गुजरे गिरि जोशि तने गुजरात नमो ठुकरावत है।

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  3. सटीक , श्री मन

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  4. सटीक और सामयिक प्रस्तुति... बधाई...

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  5. बिल्कुल सही
    बढिया रचना

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