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28 August, 2013

पाई रहा बटोर, धकेले लेकिन कुप्पा -



वंशीधर का मोहना, राधा-मुद्रा मस्त । 
नाचे नौ मन तेल बिन, किन्तु नागरिक त्रस्त । 

किन्तु नागरिक त्रस्त, मगन मन मोहन चुप्पा । 
पाई रहा बटोर, धकेले लेकिन कुप्पा । 

बीते बाइस साल, हुई मुद्रा विध्वंशी । 
चोरों की बारात, बजाये रविकर वंशी ॥ 

9 comments:

  1. कृष्ण जन्माष्टमी की बहुत बहुत शुभकामनायें

    हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः8

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  2. आपकी यह सुन्दर रचना दिनांक 30.08.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

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  5. चुप्‍पा की नीतियां अन्‍तर्विरोधों से घिरी हुईं हैं।

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  6. वाह !पाप का घडा अब फूटा के जब फूटा

    .फटा बांस रह जाएगा मत इतरावे कंस

    क्षति पूर्ती करो रविकर जी ,

    डॉलर मोटा हो रहा रुपया हो गया ध्वंश

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  7. चुप्पी क्यूं है कुछ तो बोलो मनमोहन
    रुपया नीचे गिरता नही लागे है सोहन ।

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