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30 January, 2017

हाथ छोड़ के, "गोड़ से", चरखा रहे चलाय-


(1)
कम्बल देंगे भेड़ को, खरगोशों को हैट।
हर घोड़े को नाल दूं, बिल्लों को दूँ रैट।
बिल्लों को दूँ रैट, इलेक्शन बस जितवाओ।
बहुमत की सरकार, अरे रविकर बनवाओ।
कहता रँगा सियार, प्रान्त यह होगा अव्वल।
पियें शुद्ध घी रोज, ओढ़कर भेड़ें कम्बल।।

(2)

आये गाँधी नर्क से, दो टुकड़े करवाय।
हाथ छोड़ के, "गोड़ से", चरखा रहे चलाय।
चरखा रहे चलाय, सामने तीनों बंदर।
रख के मुँह पर हाथ, हँसे इक मस्त-कलंदर।
आँख दूसरा मूँद, अदालत रोज चलाये।
कान बन्द कर अन्य, यहाँ सत्ता में आये।

3 comments:

  1. वोट पाने के लिए नेताओं ने जो दान पेटी खोली है
    इससे अच्छा व्यंग और हो ही नही सकता
    सही लिखा आपने वाह!क्या कहने...
    आये गाँधी नर्क से, दो टुकड़े करवाय।.....

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  2. आपके लेखन की व्यंजनाएँ ,और मारक क्षमता कलम की सामर्थ्य का भान करा देती हैं .

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  3. गहरा कटाक्ष ... पर सत्य की बहुत करीब ...
    बसंत पंचमी की हार्दिक बधाई ...

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